जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगीउस रोज़ शब्दों को सलीके से नहीं रखूँगी,कोई बात अधूरी नहीं छोड़ूँगी,हर बात पूरी लिखूँगी।जिन शब्दों को होंठों तक लाकरहर बार लौटा दिया था मैंने,उन शब्दों को आवाज़ देकर ख़ुलकर लिखूँगीजब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी… लिखूँगी उन ख़्वाहिशों को भी,जिनकी बारी हमेशा सबके बाद आई,और कई बार आते-आते भी नहीं आ पाई।और जो ख़्वाहिशें कभी हक़ीक़त नहीं बन पाईं,उस हर ख़्वाहिश को बेहिसाब लिखूँगीजब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी… लिखूँगी कैसे सबके हिस्से का वक़्त बचाते-बचातेमेरे हिस्से की उम्र चुपचाप गुज़र गईकैसे मैं अपनी ही ज़िंदगी में,हमेशा दूसरे पायदान पर खड़ी रह गई।ख़ुद को… Read more: जब मैं अपनी आख़िरी कविता लिखूँगी…
कभी-कभी अचानक फ़ोन बजता है और दूसरी तरफ़ से आवाज़ आती है “मनु… तू ठीक है न?” तो कभी “तूलिका… सब ठीक तो है?” मैं एक पल के लिए चुप हो जाती हूँ। सोचती हूँ, मैंने तो किसी से कुछ कहा भी नहीं। न अपनी परेशानी किसी को बताई, न ही किसी से अपने मन […]
“कुछ लोग एक रोज़ जो बिछड़ जाते है वो हजारों के आने से मिलते नहीं उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते …” तब एहसास होता है कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु नहीं, बल्कि उसका अनिश्चित होना है। हमें नहीं पता होता… कौन-सी मुलाक़ात…आख़िरी […]
कुछमेरे बारे में
नमस्कार, मैं हूँ तूलिका…
मेरे लिए लेखन सिर्फ शब्दों को कागज़ पर उतारना नहीं बल्कि जीवन को समझने और महसूस करने का एक माध्यम है।
मैं ज़िंदगी के छोटे-छोटे अनुभवों, रिश्तों, संघर्षों और अनकहे एहसासों को शब्द देने का प्रयास करती हूँ, जो अक्सर हमारे भीतर ही रह जाते हैं। सच कहूँ तो मैं जितना अधिक लिखती हूँ, ज़िन्दगी को और क़रीब से समझ पाती हूँ।
अगर मेरे लिखे शब्दों से किसी के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाये, किसी के मन को सुकून मिल पाये, किसी को आगे बढ़ने की हिम्मत मिल पाये या कोई ख़ुद को थोड़ा और समझ पाये, ख़ुद से मिल पाये, तो मुझे लगेगा है कि मेरा लिखना सार्थक हो गया।